9 वीं पास करने के बाद सीख ली किसान पद्धति, अब 1 एकड़ में 1000 क्विंटल गन्ना उगाकर कर रहा है – करोड़ों की कमाई

हमारे देश में अभी भी 80% से ज्यादा गांव है और पूरा देश खेती पर ही निर्भर करता है। अगर खेती में जरा सी भी ऊंच नीच होती है, तो शहरों तक को हिला कर रख देती है। ऐसे में एक बहुत बड़ा वर्ग किसानों का कृषि में लगा हुआ है, जो दिन और रात बस लोगों की भूख मिटा रहा है। हमारे किसान दिन भर मेहनत करते हैं, परंतु इसके बदले उन्हें उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। वह काफी परेशानियों से विविधताओं से और अभावों से जो जीते हैं एक समय ऐसी स्थिति आ जाती है कि वह आत्महत्या तक कर बैठते हैं। परंतु कुछ किसान ऐसे भी हैं जो हमेशा से यह संकल्प लेकर चलते हैं कि वह अपने कार्य को आगे बढ़ाएंगे और किसानी में ही नाम कमाएंगे। ऐसे ही एक इंसान है जो किसानों की जिंदगी बेहतर कर रहे हैं।

यह किसान 2005 से लेकर 2017 तक अपने खेतों में सिर्फ गन्ने की ही खेती करते हैं और साल का करीब एक करोड़ कमाई करके ले जाते हैं।

यह किसान एक ऐसे जिले से आता है जो मुंबई से 400 किलोमीटर की दूरी पर है। इनका नाम है सुरेश कबाड़े। इन्होने अपने इलाके में सबको आश्चर्यचकित तब कर दिया जब 19 फीट लंबे गन्ने की पैदावार करी। सुरेश कबाड़े मात्र 9 वी कक्षा तक पढ़े हैं और फिर उसके बाद उन्होंने किसान पद्धति को आगे बढ़ाने का निश्चय किया। वह किसान पद्धति को सीखने के लिए कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश तक पहुंच गए। इनकी खास बात यह है कि इन्होंने जो तकनीक इजाद करी है, उसे पाकिस्तान के किसान भी इस्तेमाल करते हैं। इस तकनीक की वजह से इनके गन्ने बाकी गन्नों से अलग होते हैं, और वजन में भी भारी होते है। इनका एक गन्ना 4 किलो तक का होता है।

सुरेश कबाड़े बताते हैं कि उनके गन्ने में 47 कांडी यानी कि 47 आंख होती हैं और इन दोनों के बीच की दूरी भी वह खुद ही तैयार करते हैं।

वह कहते हैं कि देश में अभी भी ज्यादातर लोग तीन-चार सीत पर गन्ना बोते हैं, परन्तु मैं अपने गन्नो के लिए 5 से 6 फीट की दूरी और आंख की दूरी 2 से 2.5 फिट रखता हूं , बाकी किसान सीधा खेतों में उर्वरक देते हैं। परंतु मैं गन्ने के बीच कुदाली से जुताई करता हुआ जमीन में खाद डालता हूं, मेरे हर खेत में हजार क्विंटल प्रति एकड़ का उत्पादन होता है।

पूरा देश वाकिफ है कि जिस इलाके में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या करते हैं वही एक ऐसा किसान भी है जो सालाना 15 से 70 लाख की कमाई बड़े ही आराम से कर जाता है। जबकि वहीँ दूसरी और वह हल्दी और केले को मिलाकर साल में एक करोड़ से ज्यादा का काम कर जाते है। वही बात करें साल 2015 की तो उन्होंने 1 एकड़ गन्ना उसके साथ ही उसके बीज को 28 लाख में बेचा था। इसके बाद 2016 और 2017 में 1 एकड़ गन्ने का बीज वह 3,20,000 रूपए में बेच चुके हैं। अगर अपने राज्य से हटकर बात हो तो वहां पर भी वह कम नहीं है। मध्य प्रदेश और कर्नाटक के किसान उनके यहां से बीज खरीदने आते हैं लेकिन कुछ साल पूर्व वह उन्हें परेशान किसानों में ही नजर आते थे जो भरपूर पैसे लगाने के बाद भी उत्पादन नहीं निकाल पाते थे।

उनका कहना है कि पहले उनके खेत में इतनी पैदावार नहीं होती थी, इस पैदावार को बढ़ाने के लिए उन्होंने अनोखी तकनीकें अपनाई और जब भी उनको महसूस हुआ कि किसी क्षेत्र में कमी रह गई है, तो वह वहां जाकर उसको पूरा करते। अपने खेत में भरपूर जैविक आहार और हरी खाद समय-समय पर डालते रहते। साथ में पूरक जीवाणु की भी कमी नहीं छोड़ते।

अब वह जो नई तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह है टिशु कल्चर – उनके इलाके में केले का टिशु बनाने के लिए फॉर्म मौजूद है। सबसे पहले वो इस टिशू फॉर्म से एक गन्ने का टिशु बनवाते हैं और उससे 3 साल तक फसल ले लेते हैं। आपको बता दें कि टिशु कल्चर एक ऐसा पौधा उगाने की तकनीक है जिसको प्रयोगशाला में विकसित किया गया है और इस टिशु को विशेष परिस्थितियों में रखा जाता है, जिससे कि पौधे को खुद ही इतनी क्षमता प्रदान हो जाती है कि वह अपने आप में कीड़े लगने नहीं देता और बीमार भी नहीं पड़ता।

आसान भाषा में कहे तो वह अपने आप को रोग रहित बना लेता है। आपको बता दें कि यह टिशू की खेती ना ही तो आसान है और ना ही तो सस्ती इसके लिए सुरेश को 100 मोटे लंबे और अच्छे गन्ने चुनने होते हैं, जिसमें से उनके इलाके में स्थित एक लैब के वैज्ञानिक 10 गन्ने ले जाते हैं और 1 साल में टिशू बनाकर तैयार करते हैं। इसके लिए करीब ₹8000 सुरेश लैब को दे देते हैं और फिर जो पौधा बनकर आता है उसको एफ 1 नाम से बुलाया जाता है, जो कि अपने अकार में काफी कम होता है। ऐसे में एफ 3 का इंतजार करना होता है जिसका साइज बड़ा होता है, और फल स्वरुप उसका उत्पादन भी अच्छा होता है।

जब भी वह खेती करते हैं तो उससे पहले यह जरूर सुनिश्चित कर लेते हैं कि बीज और जगह किस प्रकार है। उनका मानना है कि अपने बीज अगर खुद तैयार करे जाए तो यह किसी भी खेती के लिए बहुत फलदायक होगा। बेहतर तरीके से खेतों की जुताई करना एवं उसके लिए खाद पानी का इंतजाम करना अपने आप में एक कठिन कार्य होता है। उन्हें देखकर इलाके के अनेकों किसान इस तकनीक को अपना रहे हैं और कृषि के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं।

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